हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मौलाना सय्यद कल्बे जवाद नकवी ने कहा कि मक्का अनुबंध केवल कागजी अनुबंध है। उन्होंने कहा कि यह अनुबंध ऐसे देशों के बीच हुआ है जो खुद स्वतंत्र नहीं हैं, इसलिए इसकी कोई वास्तविक अहमियत नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि अगर इजराइल पाकिस्तान या तुर्की पर हमला करता है, तो क्या सऊदी अरब इस अनुबंध के अनुसार इजराइल पर हमला करेगा? उन्होंने कहा कि यह समझौता अमेरिका के इशारे पर किया गया है और इसे व्यावहारिक रूप देना संभव नहीं है।
मौलाना कल्बे जवाद नकवी ने कहा कि यह अनुबंध उसी दिन खत्म हो गया था, जब सऊदी अरब पर हमले के बाद संबंधित देशों ने यह कह दिया था कि यह पुराना मामला है और इसका हमसे कोई संबंध नहीं है।
उन्होंने सऊदी अरब की ओर से मक्का पर हमले से जुड़ी अफवाहें फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि इससे मुसलमानों की भावनाओं को भड़काने की कोशिश की गई। उन्होंने दावा किया कि एक सुनियोजित साजिश के तहत मक्का की ओर ड्रोन गिराया गया, ताकि इसका आरोप हूतियों पर लगाकर मुसलमानों की राय उनके खिलाफ की जा सके। हालांकि, उनके अनुसार सऊदी अरब की यह योजना सफल नहीं हुई।
मौलाना ने कहा कि सऊदी अरब अमेरिका और इजराइल का गुलाम है। उन्होंने कहा कि अरब सरकारों ने कभी मुसलमानों के हित में काम नहीं किया, बल्कि हमेशा उम्मत के हितों को नुकसान पहुंचाया है।
उन्होंने कहा कि अगर आजादी और अत्याचार के खिलाफ डटे रहने का सबक सीखना है, तो ईरान से सीखना चाहिए। उन्होंने कहा कि ईरान आज भी अत्याचारियों के खिलाफ मजबूत दीवार की तरह डटा हुआ है।
मौलाना कल्बे जवाद नकवी ने कहा कि इस समय अमेरिका और इजराइल जैसी ताकतें मुसलमानों के बीच मतभेद और बिखराव पैदा करने की कोशिश कर रही हैं। इसलिए मुसलमानों को सावधान रहने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि एकता के बिना सफलता संभव नहीं है, इसलिए अपनी एकता की ताकत को किसी भी हालत में कमजोर नहीं होने देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अगर आज अमेरिका ईरान में नाकाम हुआ है, तो इसकी सबसे बड़ी वजह ईरानी जनता की एकता है। उनके अनुसार, ईरान में अत्याचार की हार और मजलूमियत की जीत हुई है।
मौलाना ने आगे कहा कि अमेरिका फारस की खाड़ी से इतनी बदनामी और शर्मिंदगी के साथ निकलेगा कि वह दोबारा वहां आने की हिम्मत नहीं करेगा।
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